शनिवार, 20 मार्च 2010

राजा और रंक.....

क्रिकेट की पहचान है बल्ला। वही बल्ला जिसकी मांग आज तीन साल का बच्चा तक करता है। यही नहीं बुजुर्ग भी उसे कभी-कभार थामने की चाह रखते हैं। सर डॉन हो या फिर तेंदुलकर, बल्ले के दम पर क्रिकेट की दुनिया पर राज करते हैं। इसी बल्ले से एक पुछल्ला बल्लेबाज भी आईपीएल में गगनचुंबी छक्के टांग देता है। बल्ले के दम पर ही तो क्रिकेट दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेलों में लीडर बना है। या यूं कहा जाए कि इसे मंनोरंजन का सबसे बड़ा साधन बल्ले ने ही बनाया है। समय के साथ इस बल्ले में कई बदलाव आए हैं। क्रिकेट के इतिहास पर नजर डालने पर पता चलता है कि 1620 में पहली बार इंग्लैंड में इसका प्रयोग हुआ। इससे भी रोचक यह कि बल्ले की शुरूआत ही प्रहार से हुई। एक मैच के दौरान बल्लेबाज ने फील्डर को कैच पकडऩे से रोकने के लिए उसके सिर पर बल्ला दे मारा जिससे मौके पर ही फील्डर की मौत हो गई। उसी के परिणामवश लागू हुआ क्रिकेट में कानून-37(फील्डिंग में रूकावट)।

उस समय बल्ले की बनावट बिल्कु ल आज की आधुनिक हॉकी स्टिक सी थी। कारण था उस समय का गेंदबाजी स्टाइल। शुरूआती दौर में गेंदबाजी अंडरआर्म की जाती थी जिसमें गेंद जमीन पर खिसटते हुए बल्लेबाज तक पहुंचती थी। इसलिए बल्ले की इस बनावट को खेल के अनूकूल माना गया। समय बदला और 1770 आते-आते गेंदबाजी भी बदली। गेंदबाज अंडरआर्म गेंद तो फेंकते थे मगर अब हवा में लहराते हुए गेंद बल्लेबाज तक पहुंचने लगी थी। इसलिए बल्लेबाज को भी अपने बैंटिग स्टाइल में बदलाव करते हुए बल्ले के आकार को बदलने की जरूरत महसूस हूई। ऐसे में इजात हुआ आज के आधुनिक बल्ले का शुरूआत रूप, जिसमें इसने आयाताकार शेप ले ली। करीब 50 साल बाद 1820 में गेंदबाजी स्टाइल में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ और अब गेंदबाजी राउंड आर्म यानि पूरा हाथ घूमा कर की जाने लगी जिससे गेंद तेजी के साथ 22 गज का सफर तय करने लगी। और तभी से आज के आधुनिक बल्ले जिसकी लंबाई 38 इंच((965 एमएम) और मोटाई 4.25 इंच (108 एमएम) तय की गई।
( यह ग्राफिक द टेलेग्राफ से लिए गया है।)
क्रिकेट में बल्लों ने उस हॉकी स्टिक से दिखने वाले बल्ले से लेकर आज आधुनिक क्रिकेट में इन आयताकार बल्लों तक का सफर तय किया है। मगर आज भी यह बदलाव जारी है। शुक्रवार को हुए चेन्नई सुपर किंग्स और दिल्ली डेयरडेविल्स आईपीएल मुकाबले में एक अलग ही तरह के बल्ले का प्रयोग देख्रा गया। एक ऐसा बल्ला जिसकी लंबाई और भार स्टैंडर्ड बल्ले से आधा है। नाम है मोनगूज(नेवला)जो दिखने में एकदम खिलौना लगता है। लंबे हत्थे और छोटे ब्लेड वाले इस हल्के बल्ले को इसकी बनावट के अनूरूप नाम देना हो तो जिराफ से बेहतर नाम नहीं हो सकता है। ऑस्ट्रेलियाई विस्फोटक बल्लेबाज मैथ्यू हैडन ने प्रयोग के तौर पर इसे इस आईपीएल मुकाबले में किया, जो सफल भी रहा । हैडन ने मात्र 43 गेंदों में 93 रनों की पारी खेली जिसमें सात गगनचुंबी छक्के भी शामिल थे। बल्ले को ब्रिटिश स्पोर्ट्स गुड्स कंपनी मोनगूज ने डिजाइन किया है। इसकी खासियत यह कि इस बल्ले में गेंद पर प्रहार के लिए आर्दश माना जाने वाला भाग जिसे स्वीट स्ट्रोक स्पोट कहा जाता है, दुगना है। पुल या हुक शॉट खेलने या फिर शॉर्ट पिच गेंदों पर फुर्ती से प्रहार करने के लिए इस बल्ले को आदर्श माना जा रहा है। बल्ले बनावट में बदलाव का सीधा ध्येय है ज्यादा चौके-छक्के।इससे कुछ ही समय पहले भी इसी तरह बल्ले की बनावट में बदलाव किया गया है। बल्लेबाजी को और आसान बनाने के ध्येय से एक ऐसा बल्ला बनाया गया है जिससे दोनों तरफ से प्रहार किया जा सकता है। बल्ले की पिछले तरफ के नुकीले हिस्से को चपटा कर दिया गया। उद्देश्य था स्पिन गेंदबाजी का सामना करते हुए रिवर्स या स्वीप शॉट लगाने को आसान बनाना।

आज क्रिकेट की लोकप्रियता अपने चर्म पर है। इसके छोटे स्वरूप टी-20 ने इसे और भी बढ़ाया है। मगर क्रिकेट को मनोरंजन बनाने के लिए गेंदबाजों की बलि दी जा रही है। छोटे मैदान, बल्लेबाजी पिचें, लंबे छक्के, तेज चौके , पॉवर प्ले में बढ़ोतरी , फ्री हिट और अब मोनगूज और डबल साइड बल्लों का प्रयोग बल्लेबाजों को राजा तो गेंदबाजों को रंक बना रहा है। यहां मुकाबला बराबरी का नहीं रहा है। मैदान में अब गेंदबाजों की भूमिका सिर्फ गेंद फेंकने तक ही संकुचित हो रही है और ऐसे में उनसे किसी करिश्मे की उम्मीद करना भी थोड़ी बेमानी है। दुनिया की किसी भी टीम के स्वर्णिम दौर को देखने पर पता चलता है कि उस दौर में उस टीम कि गेंदबाजी मजबूत रही है. यह चाहे वेस्ट इंडीज़ रही हो या फिर पाक। साथ ही यह भी कि गेंदबाज ही किसी भी बल्लेबाज को बेहतर बनाते हैं। दुनिया के महानतम बल्लेबाजों ने अच्छे गेंदबाजों का सामना कर ही तो अपनी बल्लेबाजी को मजबूत किया है। मगर आज क्रिकेट को मंनोरंजन के रूप में परोसने के चक्कर में बल्लेबाजी आसान तो गेंदबाजी उतनी ही मुश्किल होती जा रही है। गेंदबाजी को आकर्षित और आसान बनाने के लिए कोई बदलाव आधुनिक क्रिकेट में नही हो रहे हैं। हर कोई बल्ला थामना चाहता है जो क्रिकेट को सिर्फ मंनोरंजक बनाने के लिए तो सही है मगर इस खेल में सही प्रतिभा को बाहर लाने के लिए प्रतिकूल है। बदलावों में संतुलन की दरकार है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. दोस्त काफी हद तक अच्छा है, क्रिकेट का बल्ला और उसका इतिहास बहुत बखूबी बताने की कोशिश की है, लेकिन अगर हैडन का उदहारण या ये कहें की वर्तमान पहले होता तो और मज़ा आता. उससे ऐसा लगता की आपकी पूरी बात इस सन्दर्भ में है. क्योकि किसी भी बात का रेलेवांस पहले बता दिया जाए तो ज्यादा बेहतर होता है. इसी से आपकी बातें एक-दुसरे के साथ कोन्नेक्ट होती हैं, कोई पाठक आपके ब्लॉग में बल्ले का इतिहास क्यों पढना चाहेगा, इसके लिए तो वो विकिपीडिया पर भी जा सकता है, पाठक को पहले सन्दर्भ उसका रेलिवेंस आदि चाहिए तब उसका इतिहास.... और आप पत्रकार है बात को अगर थोडा सा नाटकीय अंदाज़ या यूं कहे की टीवी वाली भाषा में पेश करने की कोशिश की जाए तोह और मज़ा आयेगा...
    बुजुर्गो वाला उदाहरण मस्त है, आज बूढ़े भी बल्ला पकड़ने में पीछे नहीं है, अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट के माननीय जजों ने भी क्रिकेट मैच खेला डेल्ही में...

    जवाब देंहटाएं
  2. i liked it.
    it's a good-unique article.
    standard class, for the reach of larger audiences you must have sent it to some print publication.

    thanks

    जवाब देंहटाएं
  3. kya baat hai.....good.

    kafi informative and professional article hai.
    bas thoda jalandhar ki sports industry k bare me bhi hona chahiye tha.....baki sab bindaaas laga.

    sukh sagar
    discussiondarbar.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं